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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

उलझन

 चंद पंक्तियाँ अर्पित हैं,

🌹🌹🌹🌹उलझन🌹🌹🌹🌹


आज ना जाने ये कैसी, अजीब सी उलझन में फंस गया हूँ मैं,

अपने ही घर की चार दीवारी में बंधकर रह गया हूँ मैं,,........


मन तो कहता है कि दूर चला जाऊं कहीं ,

हो जहां प्यार, शुकून रुक जाऊं वहीं,,........


आज न जाने किस राह पे चल पड़े हैं हम,

जो न करना था वो कर पड़े हैं हम,,.........


खुद ने ही अपनों से दूर किया है हमको,

हैं दूर उनसे जिनसे बेपनाह प्यार था हमको,,.......


हम इल्जाम किसी को दें तो क्या दें, क्योंकि वो इल्जाम के लायक ही नहीं,,

खुशियां बांटने की कसम खायी थी जिसने,

खुद की खुशियों में ग्रहण सा लग गया है कहीं,,........


इससे अच्छा तो वो बचपन था,

न खाने की चिंता ना किसी का भय था,,

गली में चिल्लाते बर्फ वाले की, भौंपू की आवाज,

जिसे सुनके सभी बच्चे लगते थे नांच,,........

वो चूरन का हुक्का, वो चूरन की पुड़िया बनवानी,

याद है मुझको वो हर एक मनमानी,,

दोस्तों के साथ की वो मौज, मस्तियाँ,

वो मिट्टी का घर, वो कागज की किस्तियाँ,,.........


हर एक पल याद आता है मुझको,

बीते लड़कपन की वो कहानी,,

उलझन सी थी मुझको, बैठा था खाली,

बस क्या था इतने में अपनी कलम उठाली,

सुनील के जो मन मे था वो लिख डाली,,......


🙏🙏सादर अर्पित🙏🙏

           सुनील कुमार

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