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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

समाज

 समाज


समाज जीवन का दर्पण है 

सर्वस्य इसी को अर्पण है 

है जीवन सफल उसी का जो  

किया जीवन इस पर समर्पण है ।


जब भेदभाव कहीं दिखता है 

जहाॅं मंडी में दूल्हा बिकता है 

तो शर्म से नजरें झुक जाती 

न जाने कहॉं से सीखता है ।


आज खंड-खंड हो गया समाज 

किसी को किसी की फिक्र नहीं 

सभी अपनी-अपनी धुन में रहते हैं 

जिन्हें जरूरत, उनकी जिक्र नहीं।


सांसों के शुरू से चलने तक 

होगा कौन जो इसको टाला है 

भला- बुरा समाज जैसा भी हो 

हर किसी को इसी ने पाला है।


 जो सभ्य समाज बनेगा तो

 यह जीवन भी सुंदर होगा 

सुख-दुख में साथ रहेंगे सब 

फिर कष्ट नहीं संभव होगा ।


जहॉं कहीं, कोई भेद नहीं हो 

आपस में कोई मतभेद नहीं हो 

जिस थाली में मिलकर खाना खाए 

उसमें कम से कम छेद नहीं हो ।


सब ढूॅंढ रहे हैं वह समाज

जो बरसों पहले हुआ करते थे 

सुख-दुख में हाथ बंटाने को 

हर पल जो तत्पर रहते थे ।


जब जागो है तभी सवेरा

 हो जाएगा दूर अंधेरा 

आओ मिलकर इसे सजाओ 

सुंदर सभ्य समाज बनाओ ।


जिस पर जन-जन का हो अभिमान 

बेहतरीन समाज का हो निर्माण 

जहॉं हो न किसी का भी अपमान 

जो बढ़ा सके देश का स्वाभिमान।


सादर समर्पित 

सुनील कुमार🌹🙏🏼

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