समाज
समाज जीवन का दर्पण है
सर्वस्य इसी को अर्पण है
है जीवन सफल उसी का जो
किया जीवन इस पर समर्पण है ।
जब भेदभाव कहीं दिखता है
जहाॅं मंडी में दूल्हा बिकता है
तो शर्म से नजरें झुक जाती
न जाने कहॉं से सीखता है ।
आज खंड-खंड हो गया समाज
किसी को किसी की फिक्र नहीं
सभी अपनी-अपनी धुन में रहते हैं
जिन्हें जरूरत, उनकी जिक्र नहीं।
सांसों के शुरू से चलने तक
होगा कौन जो इसको टाला है
भला- बुरा समाज जैसा भी हो
हर किसी को इसी ने पाला है।
जो सभ्य समाज बनेगा तो
यह जीवन भी सुंदर होगा
सुख-दुख में साथ रहेंगे सब
फिर कष्ट नहीं संभव होगा ।
जहॉं कहीं, कोई भेद नहीं हो
आपस में कोई मतभेद नहीं हो
जिस थाली में मिलकर खाना खाए
उसमें कम से कम छेद नहीं हो ।
सब ढूॅंढ रहे हैं वह समाज
जो बरसों पहले हुआ करते थे
सुख-दुख में हाथ बंटाने को
हर पल जो तत्पर रहते थे ।
जब जागो है तभी सवेरा
हो जाएगा दूर अंधेरा
आओ मिलकर इसे सजाओ
सुंदर सभ्य समाज बनाओ ।
जिस पर जन-जन का हो अभिमान
बेहतरीन समाज का हो निर्माण
जहॉं हो न किसी का भी अपमान
जो बढ़ा सके देश का स्वाभिमान।
सादर समर्पित
सुनील कुमार🌹🙏🏼
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