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नव वर्ष

 नव वर्ष  यह नववर्ष का हर्ष है  इस हर्ष का उत्कर्ष है  जोश, उमंग, उत्साह का  हो रहा अद्भुत स्पर्श है । कल क्या होगा, है नहीं पता  जो न सोचा,...

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

नव वर्ष

 नव वर्ष 


यह नववर्ष का हर्ष है 

इस हर्ष का उत्कर्ष है 

जोश, उमंग, उत्साह का 

हो रहा अद्भुत स्पर्श है ।


कल क्या होगा, है नहीं पता 

जो न सोचा, हो जाता है

पर वीर अधीर नहीं होता 

वह राह नया दिखलाता है ।


जीवन तो एक संघर्ष है 

खुब किया विचार-विमर्श है

तब निकला यह निष्कर्ष है 

संघर्ष स्वीकार सहर्ष है ।


अनुभव जीवन का गहना है 

सुख-दुख में हाथ बंटाता है 

अनुभव को तजकर दुनिया में 

कुछ हासिल नहीं कर पाता है ।


माता-पिता और बड़े-बुजुर्ग 

अनुभव का एक खजाना है 

जिसके सर इनका साया हो

वह नहीं कभी भी पराया हो ।


जो बोझिल करते थे मन को

मन व्यथित विचलित हो जाता था

सोचने की नजरिया जब बदला

 मुश्किल को आसान बना डाला।


नव वर्ष से सभी को उम्मीदें 

है हमको भी और तुमको भी 

जो कहते नहीं हैं, मौन सदा 

है लगी उम्मीदें, उनको भी ।


 सब भाव भरें अंतर्मन में 

जन-जन के जन कल्याण का

 नव वर्ष में नव निर्माण का 

 विश्व गुरु भारत महान का ।


(नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, स्वरचित रचना सादर समर्पित)


सुनील कुमार💐👏🍏🇮🇳🙏🏼

दीपावली

 🙏🙏🙏


दीपावली🪔


दिवाली का त्योहार है आया 

घर-घर दीप जला लो 

साफ-सफाई घर की कर लो 

और मिठाई खा लो ।


भूल न जाना उनको जिनको 

तुमसे आस लगी है

उनके घर भी दीपक रख दो 

जग रोशन जिनसे हुई है।


प्राची में अरुणिमा को देखो

सूरज जब बाहर आता है 

रोके किसी के नहीं रुकता

पूरी दुनियाँ में छा जाता है। 


परछाई सोचे रोक लिया पर 

कुछ ही क्षण की बात है

सूरज के आगे अंधेरों की 

कहाँ इतनी औकात है। 


जगमग धरती हो जाती है 

आती रोज दिवाली 

एक अकेला ही सदियों से 

कर रहा है रखवाली। 


आओ दीप जलाकर कर दें

रोशन कोना-कोना

छँट जाए घनघोर अंधेरा

पड़े उदास न होना।


अंतरतम का नेह निकाल 

बुझी बाती है सुलगाना

तेल दीया में रहेगा जब तक 

तब तक है प्रकाश फैलाना । 


(दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ सादर समर्पित) 

सुनील कुमार💐🙏🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔

याद

 न वो याद आ रहा है

न भुलाया जा रहा है

वो शख्स मुझे यारों

बस खाए जा रहा है 

रोता हुआ दिखे ना

मुझे वो इस वजह से

बारिश में भीग कर के

आंसू बहा रहा है 

मौसम बदल दिया है

जुल्फें उड़ा के तूने

तपती दोपहर में

अंधेरा सा छा रहा है

संघर्ष

 🙏चंद पंक्तियां अर्पित हैं 🙏


संघर्ष ही हर सफलता का रास्ता दिखाता है,

मुश्किलों में पार पाने का हौसला जगाता है।


दुश्मनों के साथ भी हम कहां खराब थे,

कांटों से घिर गए थे फिर भी गुलाब थे।


नफरत की आंधियां लाख चली मगर फिर भी ना जो बुझा 

वह चराग हैं हम, 


है वही सबब कि डरती है आंधियां मुझसे,

 मैं वह चराग हूं जिसने हवा जला दी।


में कांटों पर चलता हूं,

में बर्फ औढ़ता हूं,

में वो शीशा हूं जो पत्थर को तोड़ता हूं।


यक़ीन हो तो हर हाल रास्ता निकलता है

हवा की ओट लेकर भी चराग़  जलता है।


सादर अर्पित।🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹

समाज

 समाज


समाज जीवन का दर्पण है 

सर्वस्य इसी को अर्पण है 

है जीवन सफल उसी का जो  

किया जीवन इस पर समर्पण है ।


जब भेदभाव कहीं दिखता है 

जहाॅं मंडी में दूल्हा बिकता है 

तो शर्म से नजरें झुक जाती 

न जाने कहॉं से सीखता है ।


आज खंड-खंड हो गया समाज 

किसी को किसी की फिक्र नहीं 

सभी अपनी-अपनी धुन में रहते हैं 

जिन्हें जरूरत, उनकी जिक्र नहीं।


सांसों के शुरू से चलने तक 

होगा कौन जो इसको टाला है 

भला- बुरा समाज जैसा भी हो 

हर किसी को इसी ने पाला है।


 जो सभ्य समाज बनेगा तो

 यह जीवन भी सुंदर होगा 

सुख-दुख में साथ रहेंगे सब 

फिर कष्ट नहीं संभव होगा ।


जहॉं कहीं, कोई भेद नहीं हो 

आपस में कोई मतभेद नहीं हो 

जिस थाली में मिलकर खाना खाए 

उसमें कम से कम छेद नहीं हो ।


सब ढूॅंढ रहे हैं वह समाज

जो बरसों पहले हुआ करते थे 

सुख-दुख में हाथ बंटाने को 

हर पल जो तत्पर रहते थे ।


जब जागो है तभी सवेरा

 हो जाएगा दूर अंधेरा 

आओ मिलकर इसे सजाओ 

सुंदर सभ्य समाज बनाओ ।


जिस पर जन-जन का हो अभिमान 

बेहतरीन समाज का हो निर्माण 

जहॉं हो न किसी का भी अपमान 

जो बढ़ा सके देश का स्वाभिमान।


सादर समर्पित 

सुनील कुमार🌹🙏🏼

समौसा

 कुछ हास्य पंक्तियाँ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, आशा है आपका प्यार व मार्गदर्शन आपके आशीर्वाद के साथ पा सकूँ।


               समौसा


लिए लल्लन जी को साथ,

कैंटीन में हम पहुंचे।


कैंटीन में पहुँच के,

ऑर्डर कर दिए समौसे।


समौसे बने थे बड़े ही अच्छे,

हम भी उन पर टूट पड़े जैसे छोटे बच्चे।


अब आगे की बात बताऊं,

जो मुझ पर बीती वो समझाऊं।


समौसे पड़ गए मुझ पर भारी,

खाये समौसे क्यों मेरी मति गयी मारी।


पेट भी मेरो धीरे से अब बोलन लागो,

क्या करते हो भैया जल्दी से शौचालय भागो।


जो मुझ पे थी बीती में तुमको रहयो समझायी,

अब तक तौ या समौसे ने पेट मे आग लगायी।


जैसे तैसे शौचालय में पहुंचे हम भाई,

देख नाजारौ शौचालय कौ आँख हमरी भर आयी।


चक्कर हमको आ गयौ, 

अंदर भीड़ थी भाई।


उस दिन से आज तक समौसे को न हाथ लगाऊं,

सभी रखनो अपनो ध्यान, तुम्हें बहुविधि समझाऊं।


गरम-गरम इनको देख कर,

तुम मत ललचाना,

सोच-समझ कर भईया, समौसे तुम खाना।


🙏🙏सादर अर्पित🙏🙏

सुनील कुमार।

उलझन

 चंद पंक्तियाँ अर्पित हैं,

🌹🌹🌹🌹उलझन🌹🌹🌹🌹


आज ना जाने ये कैसी, अजीब सी उलझन में फंस गया हूँ मैं,

अपने ही घर की चार दीवारी में बंधकर रह गया हूँ मैं,,........


मन तो कहता है कि दूर चला जाऊं कहीं ,

हो जहां प्यार, शुकून रुक जाऊं वहीं,,........


आज न जाने किस राह पे चल पड़े हैं हम,

जो न करना था वो कर पड़े हैं हम,,.........


खुद ने ही अपनों से दूर किया है हमको,

हैं दूर उनसे जिनसे बेपनाह प्यार था हमको,,.......


हम इल्जाम किसी को दें तो क्या दें, क्योंकि वो इल्जाम के लायक ही नहीं,,

खुशियां बांटने की कसम खायी थी जिसने,

खुद की खुशियों में ग्रहण सा लग गया है कहीं,,........


इससे अच्छा तो वो बचपन था,

न खाने की चिंता ना किसी का भय था,,

गली में चिल्लाते बर्फ वाले की, भौंपू की आवाज,

जिसे सुनके सभी बच्चे लगते थे नांच,,........

वो चूरन का हुक्का, वो चूरन की पुड़िया बनवानी,

याद है मुझको वो हर एक मनमानी,,

दोस्तों के साथ की वो मौज, मस्तियाँ,

वो मिट्टी का घर, वो कागज की किस्तियाँ,,.........


हर एक पल याद आता है मुझको,

बीते लड़कपन की वो कहानी,,

उलझन सी थी मुझको, बैठा था खाली,

बस क्या था इतने में अपनी कलम उठाली,

सुनील के जो मन मे था वो लिख डाली,,......


🙏🙏सादर अर्पित🙏🙏

           सुनील कुमार

लेडी कांस्टेबल

 लेडी कॉन्स्टेबल


 सूरत के वरछा के मिनी बाजार में

 गुरुवार को देर रात 10:30 बजे 

वर्दी का खादी से झगड़ा हो गया 

ढूंढ रहे हैं न्याय, न जाने कहां खो गया ।


जब खादी की  खाकी से ठन गई

तो खादी की जान पर ही बन गई 

जब एक भी बात,  सुनी नहीं सुनीता 

तो लगा खादी में, लग गया जैसे पलीता ।


लाव-लश्कर के साथ जब आ धमके,

सब की क्लास ली,  सुनीता ने जमके,

जिसके मन में जो आया बड़बड़ाया, 

सभी को इसी ने अकेले चुप कराया ।


कर्फ्यू तोड़ा, तो मैंने इसको रोका 

कोई बताए इसमें क्या मैंने गलत किया ,

उल्टे जब यह अकड़ दिखाने लगे मुझ पर,

मैंने तो बस नियम का ही पालन किया।


जो भी करना है तुम कर लो 

मैं अपना फर्ज निभाऊंगी

अगर सामने मौत भी आ जाए

 वर्दी का ही कर्ज चुकाऊंगी।


 न तो मैं किसी की नौकर हूँ 

और न ही किसी से डरती हूँ 

वर्दी ने मुझे जो अधिकार दिए 

बस उसका पालन करती हूँ  ।


वर्दी की कीमत क्या होती 

खाकी ने फिर से बता दिया 

किसकी-कितनी है औकात 

एक कॉन्स्टेबल ने जता दिया ।


संज्ञान लिया,  आदेश दिए

कार्रवाई आगे की जाएगी, 

पर सवाल है लाख टके की 

दोषी को सजा मिल पाएगी -2।



(स्वरचित रचना , सादर समर्पित )


सुनील कुमार👏🙏🏼🍏🇮🇳

साँड

 कुछ पंक्तियाँ निवेदित कर रहा हूँ, आशा है कि आप सभी का स्नेह व आशीर्वाद मिलेगा। 


                साँड़


पैदा हो गया साँड़, निरंकुश घूमे वन में,

करै मनमानी काम ना चिंता उसके मन में,,


माँ-बाप और परिवारी जनों ने अच्छा समझा,

किये सदां ही कार्य सफलता धन- दौलत में,,......


करि माया अभिमान नसे में मस्त वो रहता,

बना बड़ा बदमाश कि कोई कुछ नहीं कहता,,


दस बीघा में आवास, कोठियां बनाई न्यारी,

भय का बना दवाब, समाज सब दुःख सहता,,....


कितने हत्याकांड कोई कुछ ना कर पाया,

भरा पाप का घड़ा, अंत तेजी से आया,,

सभी दलों ने उसको अब तक सीस झुकाया,

हुआ भाजपा राज उसको वहुबिधि समझाया,,....


अंत समय जब आयेगा, बुद्धि फिर जाती है,

कितने दो उपदेश समझ ना कुछ आती है,,


बढ़े पाप का वजन कि पृथ्वी घबराती है,

पापी का अंत करने में ना फिर सकुचाती है,,.........


गिरफ्तारी वारेंट दिया पहले भिजवाई,

जंगली साँड़ को पकड़ने पुलिस उसके घर आई,,


नहीं माना फिर भी साँड़ आतंकी हाथ दिखाया,

आठ पुलिस वालों को पल में मार गिराया,,.......


योगी ने की छापे मारी, उसका महल गिराया,

भाग गया वो साँड़ पुलिस के हाथ ना आया,,


करि के छापेमारी साँड़ के सहकर्मी मारे,

महाकाल के उज्जैन में साँड़ फंस गये विचारे,,.......


किया तुरंत गिरफ्तार साँड़ को मार गिराया,

एनकाउंटर का नाम पुलिस ने खुद दर्शाया,,


नेताओं में सियासत होने लगी भारी,

कहां पलटी कार सवाल पै सवाल निकारी,,......


क्या धन-दौलत साथ ले गया, क्या सुखी परिवार रहा,

रह गई बुराई पृथ्वी पर, बिना मौत मारा गया,,


हाथ जोड़ कर करूँ विनती, मतना ऐसा काम करो,

इंसानियत रूपी कर्म करो, 

सुनील की कविता का नाम करो,,.....


जय हिंद।


🙏🙏सादर अर्पित🙏🙏

सुनील कुमार