कुछ हास्य पंक्तियाँ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, आशा है आपका प्यार व मार्गदर्शन आपके आशीर्वाद के साथ पा सकूँ।
समौसा
लिए लल्लन जी को साथ,
कैंटीन में हम पहुंचे।
कैंटीन में पहुँच के,
ऑर्डर कर दिए समौसे।
समौसे बने थे बड़े ही अच्छे,
हम भी उन पर टूट पड़े जैसे छोटे बच्चे।
अब आगे की बात बताऊं,
जो मुझ पर बीती वो समझाऊं।
समौसे पड़ गए मुझ पर भारी,
खाये समौसे क्यों मेरी मति गयी मारी।
पेट भी मेरो धीरे से अब बोलन लागो,
क्या करते हो भैया जल्दी से शौचालय भागो।
जो मुझ पे थी बीती में तुमको रहयो समझायी,
अब तक तौ या समौसे ने पेट मे आग लगायी।
जैसे तैसे शौचालय में पहुंचे हम भाई,
देख नाजारौ शौचालय कौ आँख हमरी भर आयी।
चक्कर हमको आ गयौ,
अंदर भीड़ थी भाई।
उस दिन से आज तक समौसे को न हाथ लगाऊं,
सभी रखनो अपनो ध्यान, तुम्हें बहुविधि समझाऊं।
गरम-गरम इनको देख कर,
तुम मत ललचाना,
सोच-समझ कर भईया, समौसे तुम खाना।
🙏🙏सादर अर्पित🙏🙏
सुनील कुमार।
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